
पिछले कुछ हफ्तों से रुपए में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। आगे भी ये गिरावट होने के आसार दिखाई दे रहें हैं जिससे रुपए और डॉलर में फर्क आता जा रहा है। 14 जनवरी को शुरुआती कारोबार में रुपया अपने सबसे निचले स्तर से उछलकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 21 पैसे बढ़कर 86.49 पर पहुंच गया। इससे पहले भारतीय समयानुसार सुबह 09:35 बजे तक रुपया 86.5150 प्रति अमेरिकी डॉलर पर था, जो उस दिन लगभग 0.1 प्रतिशत अधिक था। सोमवार को मुद्रा कमजोर होकर 23 पैसे टूटकर लाइफ टाइम लो-लेवल 86.5825 पर आ गई थी। फिलहाल इसके पीछे कई कारण नजर आ रहे हैं। अमेरिकी मुद्रा में गिरावट और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी भी इसके पीछे का कारण बताया जा रहा है। इसमें यूएस फेड रिज़र्व द्वारा पॉलिसी रेट में कम बार कटौती की संभावना के साथ ही सबसे बड़ा हाथ विदेशी निवेशकों की लगातार जारी बिकवाली का माना जा सकता है, जिसने न केवल शेयर बाजार पर दबाव बढ़ाने का काम किया है, तो वहीं रुपये पर भी बुरा असर डाला है। दरअसल, फॉरेन इन्वेस्टर्स दुनिया भर के बाजरों से पैसे निकाल रहे हैं और मजबूत होते डॉलर के चलते अमेरिकी बाजारों में डाल रहे हैं। भारत की अगर बात करें, तो यहां के बाजारों में बिकवाली तेज नजर आई है। इसका असर रुपए की गिरावट के रूप में साफ दिख रहा है। इसके अलावा अन्य कारणों की बात करें, तो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें (81.20 डॉलर प्रति बैरल) भी इसके पीछे की वजह मानी जा सकती हैं। इसके अलावा डोनाल्ड ट्रंप द्वारा 20 जनवरी को सत्ता संभालने के बाद लिए जाने वाले संभावित फैसलों का दबाव भी भारतीय करेंसी पर दिख रहा है।


