अयोध्या की मिल्कीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव की मतगणना अंतिम चरण में है और बीजेपी के चंद्रभानु पासवान निर्णायक बढ़त बनाए हुए हैं। समाजवादी पार्टी (सपा) के अजीत प्रसाद शुरू से ही पीछे चल रहे हैं, हालांकि हर राउंड के बाद मतगणना के आंकड़े बदलने की संभावना बनी हुई थी। लेकिन अब तक के रुझानों से साफ है कि बीजेपी यहां एक बड़ी जीत दर्ज करने जा रही है। यह नतीजा बीजेपी के लिए खासा अहम है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में अयोध्या की फैजाबाद सीट पर हार के बाद यह विधानसभा उपचुनाव उनकी लोकप्रियता की नई परीक्षा थी।
लोकसभा में झटका, विधानसभा में वापसी की रणनीति
फैजाबाद लोकसभा सीट पर हार के बाद बीजेपी के लिए यह उपचुनाव साख बचाने की लड़ाई बन गया था। राम मंदिर निर्माण के बावजूद भाजपा को लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था, जिससे पार्टी को अहसास हुआ कि उसे स्थानीय स्तर की नाराजगी दूर करनी होगी। बीजेपी ने इस बार रणनीति में बदलाव करते हुए राम मंदिर दर्शन से जुड़ी पाबंदियों को हटाने के साथ-साथ स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दिया। इसके अलावा, क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों को भी जनता के सामने प्रभावी ढंग से रखा गया, जिससे मतदाताओं का झुकाव बीजेपी की ओर बढ़ा।

चंद्रभानु पासवान की व्यक्तिगत पकड़ और जातीय समीकरण
मिल्कीपुर सीट पर बीजेपी ने चंद्रभानु पासवान को मैदान में उतारा, जो यहां की राजनीति में एक मजबूत चेहरा माने जाते हैं। पासवान समुदाय के मतदाता इस सीट पर अच्छी संख्या में हैं और चंद्रभानु पासवान की पकड़ इस वर्ग में मजबूत रही है। इसके अलावा, गैर-यादव ओबीसी और सवर्ण मतदाताओं ने भी बीजेपी को समर्थन दिया, जिससे उनकी बढ़त और मजबूत होती चली गई। सपा के अजीत प्रसाद को यादव और मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन तो मिला, लेकिन यह संख्या बीजेपी के गठजोड़ के मुकाबले कमजोर साबित हुई।
BJP की जीत की सात बड़ी वजहें
मिल्कीपुर उपचुनाव में बीजेपी की बढ़त के पीछे कई कारक जिम्मेदार हैं। पहला, लोकसभा चुनाव की हार से सबक लेते हुए बीजेपी ने जमीनी स्तर पर अपनी रणनीति बदली। दूसरा, राम मंदिर दर्शन से जुड़ी पाबंदियों को हटाकर जनता की नाराजगी दूर की गई। तीसरा, स्थानीय विकास परियोजनाओं को गति दी गई। चौथा, बीजेपी ने चंद्रभानु पासवान जैसे मजबूत उम्मीदवार को टिकट दिया, जिनकी जातीय समीकरणों पर पकड़ अच्छी थी। पांचवां, सपा अपने पारंपरिक वोट बैंक को पूरी तरह संगठित नहीं कर पाई। छठा, बीजेपी के चुनाव प्रचार और बूथ प्रबंधन ने बेहतर काम किया। सातवां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता का भी फायदा बीजेपी को मिला। इन सभी कारणों ने मिलकर मिल्कीपुर में बीजेपी की जीत की नींव रखी।
सीएम योगी की सक्रियता से बदला चुनावी समीकरण
मिल्कीपुर उपचुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सक्रियता ने निर्णायक भूमिका निभाई। चुनाव की घोषणा से पहले ही सीएम योगी ने इस सीट पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया था। वह लगातार अयोध्या के दौरों के साथ-साथ मिल्कीपुर भी आते रहे। चुनावी माहौल को भाजपा के पक्ष में मोड़ने के लिए उन्होंने सरकार की योजनाओं को जनता के बीच प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया। लोकसभा चुनाव में मिली हार के बाद सीएम योगी ने मिल्कीपुर को अपनी प्रतिष्ठा की सीट बना लिया था और इसी कारण वे यहां सात बार आए, जिससे जनता में सीधा प्रभाव पड़ा।

मजबूत संगठन और मंत्रियों-विधायकों की लगातार उपस्थिति
भाजपा ने इस उपचुनाव को जीतने के लिए संगठन को पूरी तरह सक्रिय कर दिया था। इस एकमात्र सीट पर छह मंत्रियों को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके अलावा, 40 से अधिक विधायकों को भी इस सीट पर कार्य करने के निर्देश दिए गए। पूरी सीट को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर क्षेत्रीय स्तर पर रणनीति बनाई गई। मंत्रियों और विधायकों ने जातीय समीकरणों के आधार पर हर वर्ग को साधने की कोशिश की, जिससे भाजपा का जनाधार और मजबूत हुआ।
सशक्त बूथ मैनेजमेंट बना जीत का आधार
भाजपा ने इस चुनाव में बूथ मैनेजमेंट को प्राथमिकता दी। पार्टी ने पिछली चुनावी हार का विश्लेषण करते हुए यह पता लगाया कि किन क्षेत्रों से अपेक्षाकृत कम वोट मिले थे और उन्हीं क्षेत्रों में विशेष रणनीति अपनाई गई। बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय किया गया और प्रत्येक मतदान केंद्र पर भाजपा की मजबूत पकड़ सुनिश्चित की गई। प्रभारी मंत्रियों और विधायकों ने व्यक्तिगत रूप से बूथों का अवलोकन किया और अंतिम समय तक रणनीति को प्रभावी बनाए रखा।
संविधान और जातीय मुद्दे हुए कमजोर, आक्रामक प्रचार ने दिलाई बढ़त
लोकसभा चुनाव के दौरान सपा ने ‘संविधान बचाओ’ और ‘आरक्षण खत्म होने’ जैसे मुद्दों को जोरशोर से उठाया था, लेकिन इस बार यह मुद्दे चुनावी फिजा में प्रभावी नहीं दिखे। हालांकि सपा ने ‘संविधान’ और ‘पीडीए’ की बात की, लेकिन यह ज्यादा असर नहीं छोड़ पाई। इसके अलावा, भाजपा ने पासी समुदाय को साधने के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में चंद्रभानु पासवान को मैदान में उतारा, जिससे सपा के जातीय समीकरण कमजोर पड़ गए। वहीं, भाजपा ने आक्रामक चुनावी अभियान चलाया, जिसमें सीएम योगी ने कई बार अपने भाषणों में मिल्कीपुर का जिक्र किया, जिससे यह सीट चुनावी केंद्रबिंदु बन गई और भाजपा को बड़ी बढ़त हासिल हुई।



