मध्य प्रदेश के नीमच और मंदसौर जिले से लगे गांधीसागर क्षेत्र में चल रही चीता पुनर्वास परियोजना ने तेंदुओं के प्राकृतिक आवास को प्रभावित किया है। चीता संरक्षण के लिए वायर फेंसिंग और अन्य सीमांकन उपायों के कारण तेंदुओं को अपने पारंपरिक जंगल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है। इससे उनके बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं और वे मानव बस्तियों की ओर बढ़ने को मजबूर हो गए हैं। रामपुरा क्षेत्र में तेंदुओं द्वारा मानवों पर हमले की घटनाएं बढ़ने लगी हैं, जिससे स्थानीय लोग भयभीत हैं। वन विभाग ने इस समस्या के समाधान के लिए तेंदुओं को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की योजना बनाई है।
वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाएं
वन विभाग के अनुसार, चार साल में होने वाली वन्यजीव गणना कोरोना महामारी के कारण विलंबित हो गई, जिससे तेंदुओं की बढ़ी हुई संख्या का सटीक आकलन नहीं हो सका। वर्तमान में, तेंदुओं की संख्या में इजाफा हुआ है, और उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए नीमच और मंदसौर जिले की वन विभाग टीमें सक्रिय रूप से निगरानी कर रही हैं। तेंदुओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए उन्हें अन्य संभावित आवासों में स्थानांतरित करने की योजना बनाई जा रही है, जिससे उनके और इंसानों के बीच टकराव को कम किया जा सके।
किसानों की फसलों को नुकसान, समाधान की जरूरत
नीमच जिले में लगभग 18,000 नीलगाय और रोजड़ किसानों की फसलों को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि सरकार ने अनुविभागीय अधिकारियों (एसडीएम) को यह अधिकार दिया है कि वे किसानों की समस्या के समाधान के लिए आवश्यक कदम उठाएं, लेकिन अधिकतर किसानों को इस अधिकार की जानकारी नहीं है। वन्यजीवों की बढ़ती संख्या और उनकी गतिविधियों से किसान परेशान हैं और वे सरकार से इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं। वन विभाग अब इस दिशा में सक्रिय होकर संवेदनशील इलाकों में निगरानी और नियंत्रण की रणनीति बना रहा है।

पर्यावरण संरक्षण में सीएसआर फंड की भूमिका आवश्यक
नीमच वनमंडलाधिकारी एसके अटोदे के अनुसार, जिले में लगभग 11,000 करोड़ रुपये के विकास कार्य चल रहे हैं, जिनसे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इन परियोजनाओं से होने वाली आय का 2% कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड के रूप में पर्यावरण, जल संरक्षण और वन्यजीवों के संरक्षण पर खर्च किया जाना चाहिए। यदि जंगलों में जल स्रोतों का संरक्षण किया जाए, तो वन्यजीवों को अपने आवास छोड़ने की आवश्यकता नहीं होगी। पर्यावरण और वन्यजीवों की सुरक्षा केवल सरकार और वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि इसमें आम जनता की भी भागीदारी जरूरी है।
नीमच में खरमोर पक्षी के विलुप्ति का संकट
नीमच जिले में कभी बड़ी संख्या में पाया जाने वाला खरमोर पक्षी अब विलुप्त होने की कगार पर है। इसकी सबसे बड़ी वजह खेतों में कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग है, जिससे खरमोर की भोजन श्रृंखला टूट गई और यह राजस्थान की ओर पलायन कर गया। वन विभाग ने इसे बचाने के लिए प्रयास किए, लेकिन रासायनिक कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग ने इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि जैविक खेती को बढ़ावा देकर और कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग को रोककर इस संकट को कम किया जा सकता है।



