“न्याय में देरी, न्याय से इनकार के समान है”—इस सिद्धांत पर अमल करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में उच्च न्यायालयों में अस्थायी जजों की नियुक्ति का निर्देश जारी किया है। दरअसल भारत की न्यायिक प्रणाली में लंबे समय से चले आ रहे ,मामलों की समस्या का समाधान करने के उद्देश्य से उठाया गया है। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत शामिल थे, इन सब ने कहा हैं की , देश के उच्च न्यायालयों में न्याय की अपीलों का निस्तारण सही से नहीं हो रहा है। जिसकी वजह से, जिससे न्याय प्रणाली पर प्रश्न खड़े हो रहे हैं।

सरकार की भूमिका: न्याय प्रणाली में सुधार की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों में अस्थायी जजों की नियुक्ति के लिए ,केंद्र और राज्य सरकारों को तकाल कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। न्यायपालिका ने कहा कि सरकारें इस प्रक्रिया को प्राथमिकता दें, ताकि लंबे समय से लंबित अपराध मामलों का शीघ्र समाधान हो सके। यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत लिया गया है, जो अस्थायी जजों की नियुक्ति की अनुमति देता है।
सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उच्च न्यायालयों में जजों की कमी को दूर करने के लिए सक्रियता दिखाए। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और अनुभवी कानूनी विशेषज्ञों को शामिल कर , ये सुनिश्चित किया जाए कि न्यायालयों का काम सुचारू रूप से चले। सुप्रीम कोर्ट ने कहा की, न्यायपालिका और कार्यपालिका को मिलकर काम करने होगें, ताकि न्यायिक प्रक्रिया को तेज और प्रभावी बनाया जा सके।
लम्बें समय से चल रहें मामलों से कई अपराधी सजा भुगतने के बाद भी, अपनी अपीलों पर फैसले का इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले भी इन मामलों की पर चिंता जताई थी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए ,एक महत्वपूर्ण कदम उठाया हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब समय आ गया है कि, उच्च न्यायालयों में अस्थायी जजों की नियुक्ति की जाए। ये जज स्थायी जज की अध्यक्षता वाली बेंच में शामिल होकर ,अपराध से संबंधित अपीलों का निपटारा करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स में जजों की कमी को गंभीर समस्या बताते हुए, इसे न्याय में देरी का मुख्य कारण बताया है। कोर्ट ने कहा कि कई उच्च न्यायालयों में एक-एक जज पर सैकड़ों मामले लंबित हैं, जिससे न्यायिक प्रक्रिया धीमी हो रही है। पीठ ने सुझाव दिया कि अपराध से संबंधित अपीलों के मामलों की सुनवाई के लिए एक स्थायी जज के साथ एक अस्थायी जज को नियुक्त किया जा सकता है। यह व्यवस्था न केवल मामलों के निस्तारण को गति देगी, बल्कि उच्च न्यायालयों के बढ़ते वर्कलोड को भी कम करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इस दिशा में ठोस कदम उठाने की अपील की है, ताकि न्याय प्रक्रिया अधिक कुशल और प्रभावी हो सके।
अस्थायी जजों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का जोर
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों में लंबित आपराधिक अपीलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जाहिर की है। अलीगढ़ हाईकोर्ट में 63,000, पटना और कर्नाटक हाईकोर्ट में 20,000-20,000, और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में 21,000 से अधिक आपराधिक अपीलें लंबित हैं। कोर्ट ने कहा कि यह न्यायिक प्रक्रिया को धीमा कर रहा है और जनता के लिए न्याय की राह कठिन बना रहा है।
इस समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अस्थायी जजों की नियुक्ति को एक प्रभावी उपाय बताया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियुक्ति केवल आपराधिक मामलों से संबंधित अपीलों के निपटारे तक सीमित रहेगी। यह कदम न्यायिक प्रणाली को मजबूत करने और पीड़ितों को शीघ्र न्याय दिलाने के उद्देश्य से उठाया गया है।



