मध्य प्रदेश CM मोहन यादव ने बालाघाट को नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लेबल से मुक्त घोषित कर ऐतिहासिक फैसला लिया है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने शुक्रवार को घोषणा की कि राज्य का अंतिम नक्सल प्रभावित जिला बालाघाट अब इस लेबल से मुक्त हो चुका है। भोपाल में आयोजित शहरी परिवर्तन शिखर सम्मेलन 2025 के मंच से सीएम ने बताया कि यह कदम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की प्रतिबद्धता का हिस्सा है, जिसके तहत 2026 तक देश को नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
नक्सलवाद की जड़ें और बदलाव
1980 के दशक से नक्सलवाद का गढ़ बना बालाघाट, घने जंगलों और गोंड-बैगा जैसी जनजातियों की समस्याओं के चलते दशकों तक नक्सली गतिविधियों का शिकार रहा। गरीबी, खनन विवाद और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों ने असंतोष को और गहराया। लेकिन अब सरकार की सतत रणनीति, सुरक्षा बलों की कार्रवाई और विकास योजनाओं के चलते बालाघाट ने नक्सलवाद का टैग उतार दिया है, जो राज्य के लिए ऐतिहासिक जीत मानी जा रही है।
नक्सलियों का गढ़ और हिंसक दौर
बैहर और लांजी जैसे दूरस्थ गांव कभी सीपीआई (माओवादी) गुरिल्लाओं के मजबूत ठिकाने हुआ करते थे। यहां वे ‘जनता सरकार’ चलाते, भूमि का पुनर्वितरण करते और खनन कार्यों से जबरन वसूली कर विद्रोह के लिए धन जुटाते थे। 2000 के दशक में जिले का हिंसक इतिहास चरम पर था, जब पुलिस पर घात लगाकर हमले हुए और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाया गया। 2011 की एक घटना में तो नक्सलियों ने मुखबिरी के संदेह में ग्रामीणों की बेरहमी से हत्या कर दी थी।
रणनीति और पुलिस की कार्रवाई
2021 में बालाघाट, मंडला और डिंडोरी को एकीकृत नक्सल-विरोधी क्षेत्र में मिलाकर अभियान को और संगठित किया गया। 2015 के बाद आत्मसमर्पण की घटनाओं में तेजी आई और 2025 तक पूरे देश में 10,000 से ज्यादा नक्सलियों ने हथियार छोड़े। मध्य प्रदेश पुलिस की हॉक फोर्स ने भी निर्णायक भूमिका निभाई—325 नई चौकियां स्थापित कीं और छह महीनों में 10 नक्सलियों को मार गिराया। इनमें 3 जनवरी को धरमारा जंगल, 19 फरवरी को मंडला-बालाघाट सीमा और 14 जून की मुठभेड़ें शामिल हैं, जहां महिला नक्सलियों और हथियारों के साथ बड़ी कार्रवाई हुई।


